Banner शक्कर और वनस्पति तेल

शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय

हमारे बारे में :-

()शर्करा प्रभाग

शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग का एक संबद्ध कार्यालय है और चीनी तथा गन्‍ना क्षेत्र, गन्‍ना उत्‍पादकों को चीनी फैक्‍ट्रियों द्वारा गन्‍ना देयों के उचित और लाभकारी मूल्‍य (एफ आर पी) को निर्धारित करने, चीनी उद्योग के विकास और विनियमन (चीनी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रशिक्षण सहित) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के अंतर्गत चीनी की आपूर्ति से संबंधित नीतिगत विषयों सहित चीनी के उत्‍पादन, वितरण और खपत से संबंधित नीतियों के कार्यान्‍वयन हेतु उत्‍तरदायी है। यह निदेशालय खाद्य तेल क्षेत्र के प्रबंधन विशेषकर उपलब्‍धता और कीमतों की निगरानी में भी विभाग की सहायता करता है।

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(क) शर्करा प्रभाग

30.09.2017 को देश में लगभग 338 लाख मीट्रिक टन चीनी उत्‍पादन की पर्याप्‍त पेराई की क्षमता के साथ 732 चीनी मिलें स्‍थापित हैं। इस क्षमता को सरसरी तौर पर निजी क्षेत्र की तथा सहकारिता क्षेत्र की यूनिटों में बराबर विभाजित किया गया। कुल मिलाकर, चीनी मिलों की क्षमता 2500 टीसीडी से 5000 टीसीडी ब्रेकेट है लेकिन इसमें तेजी से वृद्धि हो रही है तथा यह क्षमता 10000 टीसीडी को पार कर रही है। दो आधुनिक रिफाइनरियां भी देश में गुजरात तथा पश्‍चिम बंगाल के तटवर्ती क्षेत्रों में स्‍थापित की गई हैं जो मुख्‍यतया आयातित कच्‍ची चीनी से रिफाइंड चीनी तथा घरेलू कच्‍ची चीनी से रिफाइंड चीनी का उत्‍पादन करती हैं। देश में चीनी मिलों का क्षेत्रवार ब्‍यौरा इस प्रकार है:-

क्र. सं.

क्षेत्र

फैक्‍ट्रियों की संख्‍या

1

सहकारी

327

2

निजी

362

3

सार्वजनिक

43

कुल

732*

*इसमें पश्‍चिम बंगाल और गुजरात में स्‍थित एक-एक रिफाइनरी शामिल है।

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गन्‍ना मूल्‍य बकाया

यद्यपि चीनी मिलों द्वारा गन्‍ना किसानों को भुगतान विभिन्‍न कानूनी प्रक्रियाओं और राज्‍य सरकारों द्वारा लागू नियमों के माध्‍यम से घरेलू बाजार मूल्‍य की गतिशीलता तथा निर्यात संभावनाओं से संबंधित अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍थिति द्वारा प्रभावित होता है । चीनी के अधिक उत्‍पादन के कारण घरेलू बाजार में चीनी के मूल्‍यों में मंदी आई है जिसकी वजह से गन्‍ना किसानों के गन्‍ना देयों का समय पर भुगतान करने में चीनी मिलों की नकदी की स्‍थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके परिणामस्‍वरूप, सरकार ने चीनी मिलों की नकदी को बढ़ाने के लिए विभिन्‍न स्‍कीमों को कार्यान्‍वित किया ताकि इन मौसमों के दौरान गन्‍ना मूल्‍य बकायों को न्‍यूनतम रखा जा सके। पिछले कुछ चीनी मौसमों के लिए एक ही निर्धारित तारीख को गन्‍ने के मूल्‍य के भुगतान तथा बकाया का विवरण इस प्रकार है:

मौसम

निम्‍न तारीख को स्‍थिति

कुल देय मूल्‍य

अदा किया गया कुल मूल्‍य

बकाया

देय मूल्‍य पर बकाया का %

2016-17

30/9/2017

57,205.83

55,204.66

2,001.17

3.50

2015-16

30/09/2016

60,282.38

56,992.92

3,289.46

5.46

2014-15

30/09/2015

65,934.39

57,880.17

8,054.22

12.22

2013-14

30/09/2014

58,130.24

52,173.04

5,957.20

10.25

2012-13

30/09/2013

60,008.57

56,807.64

3,200.93

5.33

2011-12

30/09/2012

51,917.00

50,949.67

967.33

1.86


सार्वजनिक वितरण प्रणाली में चीनी के वितरण की नई प्रणाली

केन्‍द्रीय सरकार ने 2012-13 से चीनी मिलों पर लेवी देयता समाप्‍त करके चीनी क्षेत्र को नियंत्रण मुक्‍त कर दिया है। संपूर्ण देश में अब राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एन एफ एस ए) 2013 सर्वत्र कार्यान्‍वित हो रहा है । एन एफ एस ए 2013 के अंतर्गत बी पी एल की कोई भी श्रेणी चिन्‍हित नहीं है । जबकि अंत्‍योदय अन्‍न योजना (ए ए वाई) के लभार्थियों को स्‍पष्‍ट रूप ये चिन्‍हित किया गया है । सरकार ने मई 2017 में चीनी सब्‍सिडी स्‍कीम की समीक्षा की है तथा यह निर्णय लिया कि समाज के गरीब से गरीब वर्ग अर्थात ए ए वाई परिवारों के लिए उनके आहार में ऊर्जा के रूप में चीनी चीनी की खपत अनिवार्य रूप से पहुंचाई जाए । तदनुसार, केन्‍द्रीय सरकार ने सहभागी राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों को 1 कि.ग्रा. प्रति माह की दर से प्रति एएवाई परिवार के लिए 18.50 रु. प्रति कि.ग्रा. की निर्धारित सब्‍सिडी जारी रखने का निर्णय लिया है । राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों को ढुलाई, परिवहन और डीलरों की कमीशन पर आने वाली अतिरिक्‍त लागत को या तो इसमें समाहित करने अथवा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत 13.50 प्रति कि.ग्रा. के खुदरा निर्गम मूल्‍य (आर.आई.पी) में जोड़कर उपभोक्‍ता पर लगाने की अनुमति दी गई है ।

चीनी का उत्‍पादन, खपत और स्‍टाक

चीनी का उत्‍पादन

भारत में चीनी का उत्‍पादन चक्रीय प्रकृति का है। प्रत्‍येक 2-3 वर्ष में चीनी का अधिकतम उत्‍पादन होता है तो फिर अगले दो-तीन वर्षों में चीनी का कम उत्‍पादन होता है। चीनी मौसम 2010-11 से 2015-16 तक देश में चीनी के अधिक उत्‍पादन को निर्यात के लिए उपयोग में लाया गया जिससे इस प्रक्रिया के कारण विदेशी मुद्रा अर्जित हो सकी । परंतु पिछले दो चीनी मौसमों के दौरान महाराष्‍ट्र और कर्नाटक के लगातार सूखे जैसे स्‍थिति बनी रहने के कारण पिछले चीनी मौसम 2016-17 में चीनी का उत्‍पादन घरेलू मांग से कम रहा । फिर भी पिछले मौसम का 77.10 लाख टन का बचा हुआ स्‍टाक और 202 लाख मी.टन का अनुमानित उत्‍पादन घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त होगा । 2012-13 से मौसम-वार चीनी का उत्‍पादन नीचे दिया गया है:-

चीनी मौसम

(अक्‍तूबर-सितम्‍बर)

चीनी का उत्‍पादन

(मात्रा लाख टन में)

2012-13

251.82

2013-14

245.54

2014-15

284.63

2015-16

251.21

2016-17 (अ)

202.27

2017-18 (प्रोजेक्‍टेड)

248.85

(अ) अनंतिम

चीनी का अंतिम स्‍टाक

2012-13 से प्रत्‍येक चीनी मौसम के अंत में चीनी का अंतिम स्‍टाक नीचे दिया गया है:-

चीनी मौसम

अंतिम स्‍टाक

2012-13

91.09

2013-14

72.13

2014-15

88.76

2015-16

77.10

2016-17 (अनु.)

39.62

(अनु.) – अनुमानित

पिछले पांच मौसमों का पिछला बचा हुआ स्‍टाक, उत्‍पादन, आयात, उपलब्‍धता, अनुमानित आंतरिक खपत, अंतशेष स्‍टाक का ब्‍यौरा नीचे दिया गया है:-

2012-13 चीनी मौसम से चीनी बैलेंस शीट

(मात्रा लाख टन में)

विवरण

2012-13

2013-14

2014-15

2015-16

2016-17

(अनंतिम)

पिछले मौसम से चीनी मिलों के पास अग्रेनित स्‍टाक

66.96

91.09

72.13

90.00

77.10

घ्‍टा- 5% समायोजित

0.95

-

-

-

-

2010-11 निर्यात मात्रा

ओजीएल -3 के लिए स्‍टाक

(अनुमत लेकिन सितम्‍बर 11 के बाद निर्यातित)

-

-

-

-

-

कुल प्रारंभिक स्‍टाक

66.01

91.09

72.13

90.00

77.10

चीनी का उत्‍पादन

251.82

245.54

284.63

251.21

202.27

आयात

6.76

1.05

-

-

4.75*

कुल अनुमानित उपलब्‍धता

324.59

337.68

356.76

341.21

284.12

आंतरिक खपत के लिए मिलों से प्रेषण

230.00

243.00

256.00

247.61

244.00

एएलएस/एएस बाध्‍यता और ओजीएल के प्रति निर्यात

3.5

22.55

12.00

16.50

0.50

घरेलू कच्‍ची सामग्री का प्रेषण

-

-

-

-

-

कुल अनुमानित रिलीज/प्रेषण

233.50

265.55

268.00

264.11

244.50

मौसम के अंत में चीनी मिलों के पास अनुमानित अंतिम स्‍टाक

91.09

72.13

88.76

77.10

39.62

* 4.75 लाख मी.टन श्‍वेत/संदर्भित चीनी के बराबर 5 लाख मी.टन का आयात ।


चीनी के मिल-पूर्व और खुदरा मूल्‍य

2009-10 से 2016-17 तक (सितम्‍बर, 2017 तक) चीनी मौसमों के दौरान देश के प्रमुख केन्‍द्रों पर चीनी (एस-30 ग्रेड) के मूल्‍यों की सीमा इस प्रकार रही:-

चीनी मौसम

(अक्‍तू्.सित.)

*चीनी के मिल-पूर्व मूल्‍यों की सीमा

(रूपए प्रति क्‍विंटल)

**चीनी के खुदरा मूल्‍य की सीमा

(रूपए प्रति किग्रा.)

2009-10

2500-4400

25.00-47.00

2010-11

2350-3090

28.00-34.00

2011-12

2540-3735

31.17-43.70

2012-13

2810-3685

32.74-41.00

2013-14

2420-3300

31.00-36.00

2014-15

2050-2860

29.35-35.87

2015-16

2350-3500

30.55-41.00

2016-17

3394-3712

40.76-43.48

स्रोत: * डेली ट्रेड मार्ट इन्‍क्‍वारी, शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय

**मूल्‍य निगरानी प्रकोष्‍ठ, उपभोक्‍ता मामले विभाग

चीनी का निर्यात

चीनी एक आवश्‍क वस्‍तु है । मिलों से इसकी बिक्री, डिलीवरी और वितरण सरकार द्वारा आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत विनियमित किया जाता था । दिनांक 15.01.1997 तक चीनी का निर्यात अधिसूचित भारतीय निर्यात एजेंसियों नामत: भारतीय चीनी एवं सामान्‍य उद्योग निर्यात-आयात निगम लिमिटेड (आई एस जी आई ई आई सी) तथा भारतीय राज्‍य व्‍यापार निगम लिमिटेड (एस टी सी) के माध्‍यम से चीनी निर्यात संवर्धन अधिनियम, 1958 के प्रावधानों के अंतर्गत किया जा रहा ।

एक अध्‍यादेश के जरिये चीनी निर्यात संवर्द्धन अधिनियम, 1958 को 15 जनवरी, 1997 से निरस्‍त कर दिया गया था और इस प्रकार चीनी का निर्यात सारणी से हटा दिया गया था। सारणी से हटाने की व्‍यवस्‍था के अधीन, चीनी का निर्यात वाणिज्‍य मंत्रालय के अधीन कृषि तथा प्रसंस्‍कृत खाद्य उत्‍पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (अपेडा) के माध्‍यम से किया जा रहा था। उसके बाद विभिन्‍न चीनी मिलों/व्‍यापारी निर्यातकों द्वारा शर्करा निदेशालय से निर्यात रिलीज आदेश प्राप्‍त करने के पश्‍चात् चीनी का निर्यात किया गया।

2006-07 और 2007-08 के चीनी मौसमों के आधिक्‍यता के चरण के दौरान, दिनांक 31.07.2007 की अधिसूचना द्वारा रिलीज आदेशों के बिना चीनी का निर्यात करने की अनुमति दी गई। तत्‍पश्‍चात्, 01.01.2009 से रिलीज आदेश प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता को पुन: लागू किया गया क्‍योंकि देश में चीनी के उत्‍पादन में कमी होने के रूझान मिल रहे थे। 2010-11 चीनी मौसम के दौरान, अधिक चीनी के उत्‍पादन को ध्‍यान में रखते हुए रिलीज आदेश पर खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के अधीन चीनी को निर्यात करने की अनुमति दी गई।

चीनी का अधिक उत्‍पादन होने का चरण जारी रहा और सरकार ने दिनांक 11.05.2012 की अधिसूचना संख्‍या 1059() द्वारा निर्यात रिलीज आदेश प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता समाप्‍त कर दी। उसके बाद चीनी का निर्यात विदेश व्‍यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) के पास मात्रा का पूर्व पंजीकरण (आर सी) करने पर मुक्‍त हो गया है। इसके बाद 7 सितंबर 2015 से पहले पंजीकरण करने की आवश्‍यकता को भी समाप्‍त कर दिया गया है। 2016-17 चीनी मौसम के दौरान चीनी के उत्‍दपादन में संभावित गिरावट के कारण, वर्तमान नीति के अंतर्गत चीनी का निर्यात ओ जी एल के तहत अब मुक्‍त कर दिया गया है बशर्तें कि 20% सीमा शुल्‍क का भुगतान किया जाए।

चीनी का आयात

चीनी का आयात जिसे मार्च, 1994 में बिना शुल्‍क के खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के अधीन रखा गया था, 27.04.1999 तक बिना सीमा शुल्‍क के जारी रहा। सरकार ने 28 अप्रैल, 1998 से आयात की गई चीनी पर 5 प्रतिशत सीमा शुल्‍क और 850/- रुपये प्रति टन की दर से प्रतिशुल्‍क लगाया। प्रतिशुल्‍क के अतिरिक्‍त, 14.04.1999 से सीमा शुल्‍क 5 प्रतिशत से बढ़ा कर 20 प्रतिशत कर दिया गया। वर्ष 1999-2000 के केन्‍द्रीय बजट में, आयात की गई चीनी पर शुल्‍क 20 प्रतिशत से और बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया था और इस पर 10 प्रतिशत अधिभार लगा दिया गया था। चीनी के आयात पर सीमा शुल्‍क पुन: बढ़ाकर 30.12.1999 को 40 प्रतिशत और 9.2.2000 को 60 प्रतिशत कर दिया गया और इसके साथ 950 रुपये प्रति टन प्रतिशुल्‍क (1.3.2008 से) जमा 3 प्रतिशत शिक्षा उपकर भी बरकरार रहा।

चीनी मौसम 2008-09 में चीनी के उत्‍पादन में गिरावट आई थी और चीनी के घरेलू स्‍टॉक को बढ़ाने के लिए केन्‍द्र सरकार ने चीनी मिलों द्वारा शून्‍य शुल्‍क पर मुक्‍त सामान्‍य लाइसेंस (ओ जी एल) के तहत दिनांक 17.04.2009 से कच्‍ची चीनी के आयात करने की अनुमति दी जो दिनांक 30.06.2012 तक जारी रही । इसके पश्‍चात दिनांक 13.07.2012 से


चीनी के आयात पर 10% की संतुलित दर से पुन: शुल्‍क लगाया गया जो बाद में बढ़ाकर 08.07.2013 से 15% कर दिया गया । देश में चीनी का स्‍टॉक ज्‍यादा होने और किसी भी संभावित आयात को रोकने के क्रम में सरकार ने दिनांक 21.08.2014 से आयात शुल्‍क को 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया जिसे बाद में 30.04.2015 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत किया गया और इसे भी बाद में बढ़ाकर दिनांक 10.07.2017 से 50 प्रतिशत कर दिया गया जो अभी भी प्रचलन में है ।

चीनी की कीमतों को उचित स्‍तर पर बनाये रखने के लिए मांग और पूर्ति में क्षेत्रीय असंतुलनों को कम से कम रखने के क्रम में सरकार ने चीनी मिलों के द्वारा 8 लाख मी.टन कच्ची चीनी का 5 लाख मी.टन के दो ट्रेचो मे 0 प्रतिशत शुल्‍क पर तथा 3 लाख मी.टन 25 प्रतिशत शुल्‍क पर आयात करने और श्‍वेत चीनी को संशाधित करने तथा इसे घ्‍रेलू खपत के लिए उपलब्‍ध रखने की अनुमति प्रदान की थी । वर्तमान चीनी मौसम 2017-18, के दौरान चीनी का उत्‍पादन 248.85 लाख मी.टन रहने का अनुमान है जो घरेलू आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त है ।

डीजीसीआईएस कोलकाता द्वारा प्रकाशित सूचना के अनुसार, चीनी मौसम 2009-10 से 2015-16 तक चीनी की निर्यात/आयात की गई मात्रा नीचे दी गई है:-

चीनी का निर्यात

चीनी मौसम (अक्‍तूबर-सितम्‍बर)

मात्रा (लाख मी. टन में)**

2009-10

2.371

2010-11

28.14

2011-12

36.74

2012-13

12.02

2013-14

26.85

2014-15

24.32

2015-16

37.98

2016-17 (जुलाई 2017 तक)

17.98

चीनी का आयात

चीनी मौसम

मात्रा (लाख मी. टन में)*

2009-10

41.80

2010-11

3.65

2011-12

1.886

2012-13

17.12

2013-14

10.788

2014-15

12.82

2015-16

19.06

2016-17 (जुलाई 2017 तक)

22.98

*विशेष प्राधिकार स्‍कीम के अंतर्गत की मात्रा शामिल है ।


गन्‍ना पेराई पर उत्‍पादन सब्‍सिडी

सरकार ने दिनांक 02.12.2015 की अधिूसचना के तहत परफारमेंस अधारित उत्‍पादन सब्‍सिछी को अधिसूचित किया जिसे बाद में 12.09.2016 की अधिसूचना के तहत 2015-16 चीनी मौसम के दौरान 19.05.2016 तक ( स्‍कीम के समापन की तारीख ) गन्‍ना पेराई पर 4.50 रू प्रति क्‍विंटल की दर से सब्‍सिडी प्रदान करना था जिसे चीनी मिलों को चीनी के लक्षित निर्यात की उपलब्‍धि की संभाव्‍यता और एथनाल सम्‍मिश्रण कार्यक्रम (ई बी पी) के अंतर्गत (एथनाल उत्‍पादन की क्षमता रखने वाली मिलों के मामले में ) तेल विपणन कंपनियों को एथनाल की लक्षित आपूर्ति के लिए भी प्रदान की गई । वित्‍तीय वर्ष 2016-17 तक उत्‍पादन सब्‍सिडी स्‍कीम के अंतर्गत 207 चीनी मिलों को 511.90 करोड़़ रुपए संवितरित किए गए ।

चीनी के मानक

खाद्य और कृषि प्रभाग (एफ ए डी-2), भारतीय मानक ब्‍यूरो (बी आई एस), की शर्करा उद्योग अनुभागीय समिति खाद्य और कृषि प्रभाग, बी आई एस के प्रमुख की सहमति से चीनी मिलों, ब्‍यापार, सरकारी संगठनों, आदि द्वारा वर्ष प्रति वर्ष प्रयोग के लिए भारतीय शर्करा के मानकों की सिफारिश करती है और चीनी और अन्‍य संबंधित मामलों के विभिन्‍न ग्रेडों के लिए कीमत विभेदकों की समीक्षा भी करती है ।

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-सुशासन पहल

चीनी क्षेत्र में डाटा प्रबंधन प्रणाली में सुधार लाने और इसे व्‍यवस्‍थित करने के लिए खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग में शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय ने मासिक आधार पर चीनी मिलों द्वारा सूचनाओं को ऑनलाइन प्रस्‍तुत करने के लिए वेब आधारित प्‍लेटफार्म (esugar.nic.in/sugar_pII) विकसित किया है। इससे सरकार को चीनी क्षेत्र के बेहतर प्रबंधन के लिए त्‍वरित और नीतिगत निर्णय लेने में सहायता मिली है। इस नई प्रणाली से चीनी मिलों के डाटा प्रबंधन के साथ-साथ सरकार के काम करने में पारदर्शिता दिखाई देती है। यह पोर्टल उत्‍पादन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए लेवी चीनी के स्‍टॉक का उपयोग, अर्द्धमासिक आधार पर चीनी मिलों का गन्‍ना मूल्‍य बकाया इत्‍यादि से संबंधित सूचना प्राप्‍त करने के लिए राज्‍य सरकारों के साथ ऑनलाइन संपर्क साधने हेतु विंडो मुहैया कराती है।

(ख) तेल प्रभाग

हमारे बारे में

यह देश में खाद्य तेलों के प्रबंधन की बहुआयामी रणनीति का समन्‍वय करता है अर्थात (i) घरेलू स्रोतों से खाद्य तेलों और इसकी उपलब्‍धता हेतु मांग का मूल्‍यांकन करना । मांग और पूर्ति के असंतुलन को खाद्य तेलों के आयात से पूरा किया जाता है ताकि उचित स्‍तर पर उनके मूल्‍यों को बरकरार रखा जाए। (ii) यह खाद्य तेलों के मूल्‍यों को घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार दोनों पर बारीकी से निगरानी रखता है और जब भी जरूरत होती है आवश्‍यक नीतिगत उपायों के लिए पहल करता है। यह प्रभाग निदेशालय के पास पंजीकृत वनस्‍पति तेल उद्योगों
द्वारा आन लाइन से प्रस्‍तुत किए गए आंकड़ों के आधार पर खाद्य तेलों के उत्‍पादन को एकत्र करता हे। खाद्य तेलों के इस मासिक उत्‍पादन के आंकड़ों को औद्योगिक उत्‍पादन के सूचकांक (आई आई पी) के संकलन के लिए सांख्‍यकीय और कार्यक्रम कार्यान्‍वयन मंत्रालय को भेजा जाता है जिसे प्रत्‍येक महीने की 12 तारीख को जारी किया जाता है। यह प्रभाग योग्‍य तकनीकी कार्मिकों से सुसज्‍जित है
, जोकि मंत्रालय को खाद्य तेलों के समन्‍वित प्रबंधन, विशेष रूप से उत्‍पादन/उपलब्‍धता और कीमतों की निगरानी/नियंत्रण से संबंधित कार्यों में सहायता करता है।

खाद्य तेल परिदृश्‍य

देश की अर्थव्‍यवस्‍था में खाद्य तेलों का महत्‍व

तिलहन और खाद्य तेल दो अत्‍यधिक संवेदनशील आवश्‍यक वस्‍तुएं हैं। भारत विश्‍व में तिलहनों के सबसे बड़े उत्‍पादकों में से एक है और यह क्षेत्र कृषि अर्थव्‍वस्‍था में एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखता है । अनुमानित उत्‍पदन का हिसाब लगाया जाए तो 15.02.2017 को कृषि मंत्रालय द्वारा जारी द्वितीय अग्रिम अनुमान के अनुसार वर्ष 2016-17 (नवम्‍बर-अक्‍तूबर) के दौरान नौ तिलहनों की खेती से 33.59 मिलियन टन तिलहनों का अनुमानित उत्‍पादन हुआ। विश्‍व तिलहन उत्‍पादन में भारत का लगभग 6-7% अंश है। वित्‍तीय वर्ष 2015-16 में लगभग 3.18 मिलियन टन तेल युक्‍त भोजन तिलहन और लघु तेल का निर्यात हुआ जिसकी कीमत 12298.78 करोड़ रूपए आंकी गई है।

भारत में सामान्‍यतया प्रयुक्‍त होने वाले तेलों की किस्‍में

भारत अपनी विभिन्‍न कृषि जलवायु क्षेत्रों में उगाई जाने वाली तिलहन फसलों की व्‍यापक सीमाओं के लिए भाग्‍यशाली है। मूंगफली, सरसों/सफेद सरसों, तिल, कुसुम, अलसी, काले तिल का तेल/एरण्‍डी का तेल प्रमुख परंपरागत रूप से उगाए जाने वाले तिलहन हैं। हाल ही के वर्षों में सोयाबीन और सूरजमुखी ने भी महत्‍वपूर्ण स्‍थान ले लिया है। नारियल सभी पौधरोपित फसलों में सबसे महत्‍वपूर्ण है। केरल और अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों सहित आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु देश के उत्‍तर-पूर्वी भाग में आयल पाम उगाने के प्रयास किए जा रहे हें। गैर-परंपरागत तेलों में राइसब्रान तेल और बिनौला तेल अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्‍त पेड़ों और वन मूल के तिलहनों जो ज्‍यादातर आदिवासी वसागत क्षेत्रों में उगाए जाते हैं, तिलहनों के महत्‍वपूर्ण स्रोत हैं। पिछले 10 वर्षों के दौरान प्रमुख तिलहनों की खेती से अनुमानित उत्‍पादन, सभी घरेल स्रोतों से खाद्य तेलों की उपलब्‍धता (घरेलू और आयात स्रोतों से) से संबंधित आंकड़े नीचे दिए गए हैं:-


( लाख टनों में)

तेल वर्ष

(नव-अक्‍तू)

तिलहनों का उत्‍पादन*

समस्‍त घरेलू स्रोतों से खाद्य तेलों की निबल उपलब्‍धता

आयात**

खाद्य तेलों की कुल उपलब्‍धता

2006-2007

242.89

73.70

46.05

119.75

2007-2008

297.55

86.54

54.34

140.88

2008-2009

277.19

84.56

74.98

159.54

2009-2010

248.83

79.46

74.64

154.10

2010-2011

324.79

97.82

72.42

170.24

2011-2012

297.98

89.57

99.43

189.00

2012-2013

309.43

92.19

106.05

198.24

2013-2014

328.79

100.80

109.76

210.56

2014-2015

266.75

89.78

127.31

217.09

2015-2016

252.50

86.30

148.50

234.80

स्रोत: *कृषि मंत्रालय द्वारा जारी (दिनांक 15.02.2017) के चौथे अग्रिम अनुमान के अनुसार

** वाणिज्‍यिक आसूचना एवं सांख्‍यिकीय महानिदेशालय

भारत में खाद्य तेलों की खपत का ढांचा

भारत एक विशाल देश है और इसके विभिन्‍न क्षेत्रों के निवासियों ने ऐसे कुछ तेलों के लिए खास पसंद विकसित की है जो अधिकतर उस क्षेत्र में उपलब्‍ध तेलों पर निर्भर करता है। उदाहरणत: दक्षिण और पश्‍चिम के लोग मूंगफली का तेल पसंद करते हैं, जबकि पूर्व और उत्‍तर वाले सरसों/सफेद सरसों का प्रयोग करते हैं। इसी तरह दक्षिण के कई क्षेत्रों में नारियल और तिल के तेल को पसंद करते हैं। उत्‍तरी मैदानों में बसे लोग मूलत: वसा के उपभोक्‍ता है और इसलिए वनस्‍पति को ही पसंद करते हैं जिसमें सोयाबीन, सूरजमुखी, राइसब्रान तेल और बिनौला तेल जैसे तेलों के आंशिक रूप से हाइड्रोजेनेटेड खाद्य तेल मिश्रण को प्रयोग में लाया जाता है। पेड़ और वन मूल के तिलहनों में से कई नए तेलों ने वनस्‍पति के जरिए खाद्य पूल में काफी हद तक अपना रास्‍ता बना लिया है। इसके बाद स्‍थितियां काफी बदल गई है। आधुनिक तकनीकी साधनों के माध्‍यम से जैसे कि वास्‍तविक परिष्‍करण, ब्‍लीचिंग और डी-ओडराइजेशन से सभी तेल व्‍यवहारिक रूप से रंगहीन, सुगंधरहित और स्‍वादरहित होते है और इसलिए रसोईघर में आसानी से आपस में बदल लिए जाते हैं। तेल जैसे-सोयाबीन, बिनौला, सूरजमुखी, राइसब्रान, पाम तेल और उसके तरलांश पामोलीन जिसको पहले जाना भी नहीं जाता था वे अब रसोईघर में प्रवेश कर गए है। खाद्य तेल बाजार में कच्‍चे तेल, परिष्‍कृत तेल और वनस्‍पति का कुल अंश मोटे तौर पर क्रमश: 35%, 60% और 05% अनुमानित है। खाद्य तेलों की घरेलू मांग का लगभग 50% आयात से पूरा किया जाता है जिसमें से पाम तेल/पामोलीन का लगभग 80% हिस्‍सा है। पिछले कुछ वर्षों में परिष्‍कृत पामोलीन (आर बी छी पामोलीन) की खपत के साथ-साथ अन्‍य तेलों


के साथ उसका मिश्रण काफी हद तक बढ़ गया है और होटल, रेस्‍टोरेन्‍ट और विभिन्‍न प्रकार के खाद्य उत्‍पादों को बनाने में बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल किया जाता है।

खाद्य तेल अर्थव्यवस्‍था की प्रमुख विशेषताएं

इसकी दो प्रमुख विशेषताएं है, जिसने इस क्षेत्र के विकास में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। पहला था 1986 में तिलहनों पर प्रौद्योगिकी मिशन की स्‍थापना जिसे 2014 में तिलहनों और तेल पाम (एनएमओओपी) पर राष्‍ट्रीय मिशन में बदल दिया गया। इससे तिलहनों के उत्‍पादन को बढ़ाने में सरकारी प्रयासों को चुनौती मिली। तिलहनों के उत्‍पादन में 1986-87 में लगभग 11.3 मिलियन टन से 2015-16 में 25.25 मिलियन टन की बहुत प्रभावशाली वृद्धि से यह स्‍पष्‍ट हो जाता है। अधिकतर तिलहनों की खेती सीमांत भूमि पर की जाती है और वह वर्षा और अन्‍य मौसमी दशाओं पर निर्भर होता है। अन्‍य प्रभावी विशेषता जिसका खाद्य तिलहनों/तेल उद्योग की वर्तमान स्‍थिति पर महत्‍वपूर्ण प्रभाव पड़ा, वह था उदारीकरण कार्यक्रम जिसके अंतर्गत सरकार की आर्थिक नीति ने खुले बाजार को अधिकांशत: स्‍वतंत्रता प्रदान करते हुए तथा सुरक्षा और नियंत्रण के बजाए स्‍वस्‍थ स्‍पर्धा और स्‍व विनियमन को प्रोत्‍साहित किया है। नियंत्रणों और विनियमों में ढील दी गई है जिसके परिणामस्‍वरूप घरेलू और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों दोनों द्वारा बाजार को अत्‍यंत प्रतिस्‍पर्धात्‍मक बना दिया गया है।

खाद्य तेलों पर निर्यात - आयात नीति

किसानों, संसाधनों और उपभोक्‍ताओं के हितों को संगत बनाने के क्रम में और ठीक उसी समय यथा संभावित खाद्य तेलों के विशाल आयात का विनियमन करने हेतु खाद्य तेलों को आयात शुल्‍क संरचना की समय-समय पर समीक्षा की जाती है। कच्‍चे और परिष्‍कृत खाद्य तेलों पर वर्तमान में आयात शुल्‍क 23.09.2016 से क्रमश: 12.5% और 20% है जबकि कच्‍चे पाम आयॅल पर आयात शुल्‍क को 12.5% से घटाकर 7.5% किया गया तथा आर बी डी पामोलीन पर आयात शुल्‍क को 20% से घटा कर 15% कर दिया गया । अन्‍य सभी कच्‍चे और रिफाइंड तेलों पर आयोत शुल्‍क को क्रमश: 12.5% और 20% पर रखा गया है ।

खाद्य तेलों के निर्यात पर 17.03.2008 से प्रतिबंध लगा दिया गया था। फिर भी, 5.2.2013 से इलेक्‍ट्रानिक डाटा इंटरचेंज (ईडीआई) बंदरगाहों से एरंडी तेल, नारियल तेल तथा अधिसूचित भूमि सीमा शुल्‍क स्‍टेशनों और उपवन उत्‍पादों से उत्‍पादित कुछ खाद्य तेलों और जैविक खाद्य तेलों पर खाद्य तेलों के निर्यात पर लगे प्रतिबंध पर छूट दी गई है। 06.02.2015 से 5 किलो तक ब्रांडेड उपभोक्‍ता पैकों में खाद्य तेलों के निर्यात की अनुमति दी गई है बशर्तें कि न्‍यूनतम निर्यात मूल्‍य 900 प्रति मी.टन अमेरिकी डालर हो। थोक में राइस ब्रान तेल के निर्यात पर लगी रोक में दिनांक 06.08.2015 से छूट दी गई है जबकि मूंगफली का तेल, तिल का तेल, सोयाबीन तेल, तथा मक्‍की के तेल पर लगे प्रतिबंध पर 27.03.2017 से छूट दी गई है ।


वनस्‍पति मूल के प्रमुख खाद्य तेलों पर आयात शुल्‍क का ऐतिहासिक ढांचा

तेल का नाम

आयात सेवा की दर/प्रभावी तिथियां

कच्‍चा पाम तेल

70 % (11/08/06)

60%

(24/01/07)

50% (13/04/07)

45% (23/07/07)

20% (21/03/08)

0%

(01/04/08)

0%

(17/03/12)

2.5% (23/01/13)

2.5%

(23/01/13)

7.5%

(24/12/14)

12.5%

(17/09/15)

7.5%

(23.9.2016)

आरबीडी पामोलीन

80 % (11/08/06)

67.5% (24/01/07)

57.5% (13/04/07)

52.5% (23/07/07)

27.5% (21/03/08)

7.5 % (01/04/08)

7.5 % (17/03/12)

7.5 % (17/03/12)

10%

(20/01/14)

15%

(24/12/14)

20%

(17/09/15)

15%

23.9.2016)

कच्‍चा सोयाबीन तेल

40% (23/07/07)

0%

(01/04/08)

20% (18/11/08)

0% (24/03/09)

0%

0%

0% ((17/03/12)

2.5% (23/01/13)

2.5%

(23/01/13)

7.5%

(24/12/14)

12.5%

(17/09/15)

परिष्‍कृत सोयाबीन तेल

40% (23/07/07)

7.5 % (01/04/08)

7.5 % (18/11/08)

7.5 % (24/03/09)

7.5 %

7.5 %

7.5 % (17/03/12)

7.5 % (17/03/12)

10%

(20/01/2014)

15%

(24/12/14)

20%

(17/09/15)

कच्‍चा सूरजमुखी तेल

65% (24/01/07)

50% (01/03/07)

40% (23/07/07)

20% (21/03/08)

0% (01/04/08)

0% (24/03/09)

0%

(17/03/12)

2.5% (23/01/13)

2.5%

(23/01/13)

7.5%

(24/12/14)

12.5%

((17/09/15)

परिष्‍कृत सूरजमुखी तेल

75% (24/01/07)

60% (01/03/07)

50% (23/07/07)

27.5% (21/03/08)

7.5 % (01/04/08)

7.5 % (24/03/09)

7.5 % (17/03/12)

7.5 % (17/03/12)

10%

(20/01/2014)

15%

(24/12/14)

20%

(17/09/15)


2014-15 के दौरान खाद्य तेलों के संबंध में हाल ही के प्रमुख निर्णय

1.दिनांक 27 मार्च, 2017 की अधिसूचना सं. 43/2015-20 के तहत मूंगफली का तेल, तिल का तेल, सोयाबीन तेल और मक्‍की के तेल को खाद्य तेलों पर लगे प्रतिबंध से छूट दी गई है ।

2.दिनांक 23 सितम्‍बर, 2016 की अधिसूचना सं. 51/2016-सीमा शुल्‍क के तहत कच्‍चे पाम तेल पर आयात शुल्‍क को 12.5% से घटाकर 7.5% तक कर दिया गया है जबकि अन्‍य कच्‍चे तेलों के लिए यह शुल्‍क 12.5% पर ही रखा गया है। अन्‍य सभी कच्‍चे और परिष्‍कृत तेलों पर आयात शुल्‍क क्रमश: 12.5% और 20% पर रख दिया गया है।

3.5 अगस्‍त, 2011 से भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई)अधिनियम, 2006 के कार्यान्‍वयन के साथ खाद्य तेल उद्योगों को लाइसेंस,सुरक्षा और मानक मापदंडों को जारी करने के लिए भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई)द्वारा शासित किया जाता है। तथापि,वनस्‍पति तेल उत्‍पाद,उत्‍पादन और उपलब्‍धता(वी ओ पी पी ए) (विनियमन)आदेश, 2011 के तहत खाद्य तेल उद्योगों के लिए खरीद की निगरानी शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय द्वारा की जाती है।

ई-सुशासन की पहल

वनस्‍पति तेल क्षेत्र में आंकड़े प्रबंधन प्रणाली में सुधार और सुव्‍यवस्‍थित करने के क्रम में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के अंतर्गत शर्करा और वनस्‍पति तेल निदेशालय ने वनस्‍पति तेल उत्‍पादकों द्वारा मासिक आधार पर आनलाइन सूचना प्रस्‍तुत करने के लिए वैब आधारित प्‍लेटफार्म (evegoils.nic.in) विकसित किया है। इससे सरकार को वनस्‍पति तेल क्षेत्र के अच्‍छे प्रबंधन के लिए त्‍वरित और प्रभावकारी नीति निर्णयों को लेने में मदद मिली है। इस नई प्रणाली से वनस्‍पति तेल उद्योग के आंकड़े प्रबंधन के साथ-साथ सरकार के कार्यों में पारदर्शिता भी देखने को मिलती है। यह पोर्टल आन लाइन पंजीकरण और मासिक उत्‍पादन विवरण को प्रस्‍तुत करने के लिए विंडो प्रदान करता है।

वनस्‍पति तेल उद्योग की स्‍थिति (13.04.2017 के अनुसार)

1.वनस्‍पति तेल उत्‍पाद, उत्‍पादन और उपलब्‍धता (विनियमन) आदेश, 2011 के तहत निदेशालय के साथ पंजीकृत वनस्‍पति तेल उद्योग का प्रकार

क्रम सं.

उद्योग का प्रकार

पंजीकृत इकाइयों की संख्‍या

1

वनस्‍पति, इंटेरेस्‍टेफाइड वनस्‍पति तेल और वसा

100

2

विलायक संयंत्र और तेल मिलों के साथ रिफाइनरी

205

3

तेल मिल और सम्‍मिश्रित खाद्य वनस्‍पति तेल

164

4

विलायक निष्‍कर्षण इकाईयां

123

कुल

592

विभिन्‍न वनस्‍पति तेल विनिर्माण संयंत्रों की वार्षिक क्षमता :

क्रम सं.

संयंत्र का नाम

वार्षिक क्षमता (लाख मी.टन. में)

1

तेल मिल एक्‍सपैलर

58.6

2

विलायक निष्‍कर्षण संयंत्र

5047.1

3

रिफाइनरी

1558.7

4

हाइड्रोजनरेशन संयंत्र

51.1

5

इंटेरेस्‍टीफाइड वनस्‍पति वसा

15.3

6

मार्गरीन स्‍परेड

7.1

7

सम्‍मिश्रित खाद्य वनस्‍पति तेल

55.3

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