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चीनी

सामान्‍य

चीनी उद्योग कृषि‍ आधारित एक महत्‍वपूर्ण उद्योग है जिससे गांवों में लगभग 50 मिलियन गन्‍ना किसानों को आजीविका मिलती है और इसमें लगभग 5 लाख कामगारों को चीनी मिलों में सीधे रोजगार मिला हुआ है। इसके साथ ही चीनी उद्योग से जुडे विविध सहायक कार्यों जैसे परिवहन, व्‍यापार, मशीनरी की सर्विसिंग तथा कृषि आदानों की आपूर्ति से जुड़ी गतिविधियों में भी रोजगार सृजित होते हैं। भारत विश्‍व में ब्राजील के बाद दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्‍पादक देश है और चीनी की सबसे अधिक खपत वाला देश भी है। आज भारतीय चीनी उद्योग का वार्षिक उत्‍पादन लगभग 80,000 करोड़ रूपए मूल्‍य का है। 31.01.2018 की स्‍थिति के अनुसार देश में इस समय 735 चीनी मिलें स्‍थापित हैं जिनकी पेराई क्षमता लगभग 340 लाख टन चीनी उत्‍पादन की है। इस क्षमता को मोटे तौर पर निजी क्षेत्र की तथा सहकारिता क्षेत्र की यूनिटों में बराबर विभाजित किया गया है।

गन्‍ना मूल्‍य निर्धारण नीति

22.10.2009 को गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 में संशोधन करने के साथ, गन्ने के सांविधिक न्यूनतम मूल्य की अवधारणा के स्थान पर 2009-10 और बाद के चीनी मौसमों के लिए गन्ने के ‘उचित और लाभकारी मूल्य’ की अवधारणा लाई गई थी। केन्द्रीय सरकार द्वारा कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर और राज्य सरकारों के साथ विचार-विमर्श के पश्चात तथा चीनी उद्योग की एसोसिएशनों से सूचना लेकर गन्ना मूल्य निर्धारित किया जाता है और उसकी घोषणा की जाती है । गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 के संशोधित उपबंधों में निम्नलिखित घटकों को ध्यान में रखते हुए गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य निर्धारित करने का प्रावधान है:-

क. गन्ने की उत्पादन लागत;

ख. वैकल्पिक फसलों से उत्पादकों को लाभ तथा कृषि जिंसों के मूल्यों की सामान्य प्रवृत्ति;

ग. उपभोक्ताओं को उचित दर पर चीनी की उपलब्धता;

घ. उत्‍पादनकर्ताओं द्वारा गन्ने से उत्पादित चीनी जिस मूल्य पर बेची जाती है;

ङ. गन्ने से चीनी की रिकवरी;

च. सह-उत्पादों अर्थात शीरा, खोई तथा प्रैस मड के विक्रय से प्राप्त राशि या उनके अभ्यारोपित मूल्य (29.12.2008 की अधिसूचना द्वारा अंत:स्‍थापित)

छ. जोखिम और लाभ के खाते पर गन्‍ना उत्‍पादकों के लिए उचित मार्जिन (22.10.2009 की अधिसूचना द्वारा अंत:स्‍थापित)

उचित और लाभकारी मूल्य की प्रणाली के अधीन, किसानों को मौसम के अंत की अथवा चीनी मिलों या सरकार द्वारा लाभों की किसी घोषणा की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। नई प्रणाली में इस तथ्य का ख्याल किए बिना किसानों को लाभ और जोखिम के प्रति मार्जिन भी आश्वस्त किए गए हैं कि भले ही चीनी फैक्ट्रियों को लाभ होता है या नहीं और ये किसी चीनी मिल विशेष के कार्य निष्पादन पर निर्भर नहीं है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि अपेक्षाकृत अधिक चीनी रिकवरियों का पर्याप्त रूप से प्रतिफल दिया जाता है और चीनी मिलों के बीच विभिन्नताओं पर विचार करते हुए, गन्ने से चीनी की अधिक रिकवरी के लिए किसानों को देय प्रीमियम के साथ उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) चीनी की मूल रिकवरी दर से सम्बद्ध हैं।

तदनुसार, चीनी मौसम 2017-18 के लिए उचित और लाभकारी मूल्य 9.5 प्रतिशत की मूल रिकवरी पर 255/- रूपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है जिसमें मूल रिकवरी स्तर में प्रत्येक 0.1 प्रतिशत प्‍वाइंट की वृद्धि के लिए 2.68 रूपये का प्रीमियम देने का प्रावधान है।

चीनी फैक्ट्रियों द्वारा 2009-10 से 2017-18 तक प्रत्येक चीनी मौसम के लिए देय उचित और लाभकारी मूल्य निम्नलिखित सारणी में दिए गए हैं:-

चीनी मौसम

उचित और लाभकारी मूल्य

(रूपये प्रति क्विंटल)

मूल रिकवरी स्तर

2009-10

129.84

9.5%

2010-11

139.12

9.5%

2011-12

145.00

9.5%

2012-13

170.00

9.5%

2013-14

210.00

9.5%

2014-15

220.00

9.5%

2015-16

230.00

9.5%

2016-17

230.00

9.5%

2017-18

255.00

9.5%

डा. सी. रंगाराजन समिति की सिफारिशों के आधार पर चीनी क्षेत्र को नियंत्रण मुक्‍त करना

वर्ष 2013-14 चीनी क्षेत्र के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष था। केंद्र सरकार ने चीनी क्षेत्र के विनियंत्रण से संबंधित डॉ. सी रंगराजन की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफ़ारिशों पर विचार किया था और सितम्बर, 2012 के बाद उत्पादित चीनी पर मिलों की लेवी बाध्यता की प्रणाली को समाप्त करने और चीनी की खुले बाजार में बिक्री संबंधी विनियमित निर्गम तंत्र को समाप्त करने का निर्णय लिया था। चीनी क्षेत्र का विनियंत्रण चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार करने, नकद प्रवाह में वृद्धि करने, इनवेंटरी लागत को कम करने और गन्ना किसानों को उनके गन्ना मूल्य के यथासमय भुगतान के लिए किया गया था। गन्ना क्षेत्र आरक्षण, न्यूनतम दूरी संबंधी मानदंड और गन्ना मूल्य फार्मूला को अपनाने के बारे में समिति द्वारा की गई सिफ़ारिशें निर्णय एवं कार्यान्वयन हेतु राज्य सरकारों को भिजवा दी गई हैं, जैसा वे उचित समझें। समिति की सिफ़ारिशों के सारांश एवं सरकार द्वारा उन पर की गई कार्रवाई का ब्यौरा इस अध्‍याय के अनुबंध-1 में दिया गया है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से अंत्‍योदय अन्‍न योजना परिवारों को चीनी के वितरण हेतु मौजूदा पद्धति की समीक्षा

राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से चीनी का वितरण राजसहायता प्राप्‍त मूल्‍यों पर किया जाता था जिसके लिए केंद्र सरकार सहभागी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों प्रशासनों द्वारा वितरित चीनी पर 18.50 रुपए प्रति कि.ग्रा. की दर पर प्रतिपूर्ति कर रही थी। यह स्‍कीम 2001 की जनगणना के अनुसार देश की संपूर्ण बीपीएल जनसंख्‍या को तथा पूर्वोत्‍तर राज्‍यों/विशेष श्रेणी/पहाड़ी राज्‍यों/द्वीप समूहों की संपूर्ण जनसंख्‍या को कवर करती थी।

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 को अब सभी 36 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा सार्वजनिक रूप से कार्यान्‍वित किया जा रहा है। एनएफएसए के तहत, बीपीएल की कोई पहचानशुदा श्रेणी नहीं है, तथापि, अंत्‍योदय अन्‍न योजना के लाभार्थियों की स्‍पष्‍ट रूप से पहचान की गई है। भारत सरकार ने चीनी राजसहायता स्‍कीम की समीक्षा की है तथा यह निर्णय लिया है कि समाज के निर्धनतम परिवारों अर्थात अंत्‍योदय अन्‍न योजना परिवारों को ऊर्जा के स्रोत के रूप में चीनी की खपत को उनकी पहुंच में लाना अनिवार्य है। तदनुसार, केंद्र सरकार ने यह निर्णय लिया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से चीनी के वितरण की मौजूदा प्रणाली को निम्‍नानुसार जारी रखा जाए:-

(i) सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से राजसहायता प्राप्‍त चीनी की आपूर्ति संबंधी मौजूदा स्‍कीम को केवल अंत्‍योदय अन्‍न योजना वाले परिवारों के सीमित कवरेज हेतु जारी रखा जाए। उन्‍हें प्रति परिवार प्रतिमाह 1 किलोग्राम चीनी उपलब्‍ध करायी जाएगी।

(ii) केंद्र सरकार द्वारा राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए वितरित की जा रही चीनी पर दी जा रही 18.50 रुपए प्रति किलोग्राम की राजसहायता को अंत्‍योदय अन्‍न योजना जनसंख्‍या हेतु जारी रखा जाए। राज्य/संघ राज्य क्षेत्र 13.50 के खुदरा निर्गम मूल्‍य के अलावा ढुलाई, हैंडलिंग तथा डीलरों की कमीशन के रूप में किसी अतिरिक्‍त व्‍यय को लाभार्थी से वसूल कर सकते हैं अथवा वे इसे स्‍वंय वहन कर सकते हैं।

उपर्युक्‍त निर्णय के अनुसरण में, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अंत्‍योदय अन्‍न योजना परिवारों हेतु चीनी के वितरण के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को चीनी राजसहायता की प्रतिपूर्ति हेतु संशोधित दिशा-निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं।

इथेनोल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम (ईबीपी कार्यक्रम)

इथेनोल कृषि आधारित उत्‍पाद है, जिसका उत्पादन मुख्यतः चीनी उद्योग के सह-उत्पाद नामत: शीरे से किया जाता है। गन्ने के अधिशेष उत्‍पादन वाले वर्षों में, जब चीनी की कीमतें काफी कम हो जाती हैं तो चीनी उद्योग किसानों के गन्‍ने की कीमत का समय पर भुगतान करने में असमर्थ हो जाता है। इथेनोल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम का उद्देश्य प्रदूषण को कम करने के लिए मोटर स्पिरिट के साथ इथेनोल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को प्राप्त करना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और चीनी उद्योग में मूल्य वर्धन में वृद्धि करना है ताकि वे किसानों को गन्‍ना मूल्‍य की बकाया राशि का भुगतान कर सकें। केन्द्रीय सरकार ने इथेनोल मिश्रित कार्यक्रम (ईबीपी) के अंतर्गत ब्लेंडिंग का लक्ष्य 5% से बढ़ाकर 10% कर दिया है। समस्त इथेनोल आपूर्ति श्रृंखला को सुप्रवाही बनाने के लिए इथेनोल मिश्रित कार्यक्रम के अंतर्गत इथेनोल की खरीद प्रक्रिया को सरल बनाया गया है और इथेनोल का लाभकारी डिपो-द्वार मूल्य निर्धारित किया गया है। नए ब्लेंडिंग लक्ष्य को प्राप्त करना सुगम बनाने के लिए डिस्टिलरियों को ओएमसी डिपुओं से जोड़ने वाली एक "ग्रिड” तैयार की गई है और आपूर्ति की जाने वाली मात्रा का ब्यौरा तैयार किया गया है। दूरी, क्षमता तथा अन्य क्षेत्रवार मांगों को ध्यान में रखते हुए राज्यवार मांग प्रोफाईल का भी अनुमान लगाया गया है। चीनी मिलों द्वारा इथेनोल ब्लेंडिंग कार्यक्रम हेतु तेल विपणन कम्पनियों को वर्ष 2015-16 (10 अगस्‍त, 2016 तक) के दौरान आपूर्ति किए जाने वाले इथेनोल पर उत्पाद शुल्क भी माफ कर दिया गया है। परिणाम बहुत ही उत्‍साहजनक रहे हैं तथा सप्‍लाई प्रतिवर्ष दोगुनी हो गई है। वर्ष 2013-14 में, ब्‍लेंडिंग हेतु केवल 38 करोड़ लीटर इथेनोल की आपूर्ति की गई थी, जबकि संशोधित ईबीपी के तहत आपूर्ति बढ़कर 67 करोड़ लीटर हो गई है। इथेनोल मौसम 2015-16 में इथेनोल आपूर्ति ऐतिहासिक रूप से अधिक रही है तथा यह बढ़कर 111 करोड़ के पार हो गई है तथा इसने 4.2 प्रतिशत का ब्‍लेंडिग लक्ष्‍य प्राप्‍त कर लिया है। इथेनोल मौसम 2016-17 में, दिए गए 80 करोड़ लीटर के ठेके में से लगभग 66.51 करोड़ लीटर की आपूर्ति कर दी गई है। इसके अलावा, इथेनोल मौसम 2017-18 में 139.51 करोड़ लीटर इथेनोल की आपूर्ति हेतु आशय पत्र जारी कर दिया गया है जिसमें 136 करोड़ लीटर हेतु करार पर हस्‍ताक्षर किए गए हैं तथा अब तक 46.25 करोड़ लीटर की आपूर्ति की जा चुकी है। इसके अलावा, तेल निर्यात कंपनियों द्वारा इथेनोल ब्‍लेडिंग कार्यक्रम के तहत 117 करोड़ इथेनोल की खरीद हेतु बोली लगाने के लिए निविदा का दूसरा दौर खोला गया था।

चीनी उपक्रमों को वित्‍तीय सहायता प्रदान करने संबंधी स्‍कीम (एसईएफएएसयू-2014)

सरकार ने चीनी उपक्रमों को वित्‍तीय सहायता प्रदान करने हेतु स्‍कीम (एसईएफएएसयू 2014) 03.01.2014 को अधिसूचित की थी जिसमें चीनी मिलों को पूर्ववर्ती चीनी मौसमों के गन्‍ना मूल्‍य की बकाया राशियों का भुगतान करने तथा गन्‍ना किसानों को वर्तमान चीनी मौसम हेतु गन्‍ना मूल्‍य का समय पर निपटारा करने के लिए बैंकों द्वारा ब्‍याज मुक्‍त ऋण दिए जाने की परिकल्‍पना की गई है। स्‍कीम के तहत 6485.69 करोड़ रुपए की राशि वितरित की गई है। इस ऋण पर पांच वर्षों हेतु ब्‍याज-भार चीनी विकास निधि के माध्‍यम से सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। चीनी कारखानों द्वारा लिए गए ऋण पर ब्‍याज में छूट हेतु बैंकों को 2330.96 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है।

गन्‍ना मूल्‍य की बकाया के भुगतान को सुगम बनाने हेतु चीनी मिलों को सरल ऋण

चीनी मौसम 2014-15 के गन्‍ना मूल्‍य की बकाया राशि का भुगतान सुगम बनाने हेतु चीनी मिलों को सरल ऋण उपलब्‍ध कराने के लिए 23.06.2015 को एक स्‍कीम अधिसूचित की गई थी। बैंकों द्वारा इस स्‍कीम के तहत 4213 करोड़ रुपए की राशि का वितरण किया गया है। एक वर्ष के स्‍थगन काल के दौरान 10 प्रतिशत तक की वार्षिक ब्‍याज छूट की राशि सरकार द्वारा वहन की जाएगी। इससे लगभग 32 लाख किसान लाभान्‍वित हुए हैं। चीनी कारखानों द्वारा लिए गए ऋण पर ब्‍याज माफी हेतु बैंकों को 431.70 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है।

उत्पादन सब्सिडी

सरकार ने चीनी मिलों को गन्ने की लागत की भरपाई करने और चीनी मौसम 2015-16 के लिए किसानों को देय गन्ना मूल्य बकाया का यथासमय भुगतान सुगम बनाने के लिए दिनांक 02.12.2015 की अधिसूचना द्वारा 4.50 रुपए प्रति क्विंटल की दर से उत्पादन सब्सिडी भी प्रदान की है। चीनी मूल्‍यों में चीनी उद्योग के प्रचालनात्‍मक व्‍यवहार्यता से अपेक्षित स्‍तरों से पर्याप्‍त वृद्धि हो जाने के परिणामस्‍वरूप, केंद्रीय सरकार ने दिनाक 19.05.2016 की अधिसूचना के तहत उत्‍पादन सहायता स्‍कीम वापस ले ली थी। चूंकि उत्‍पादन सहायता सहायता स्‍कीम को समय से पूर्व वापस ले लिया गया था, इसलिए केंद्र सरकार ने दिनांक 12.09.2016 की अधिसूचना के तहत 2015-16 चीनी मौसम से स्कीम के कार्यकाल की अवधि के दौरान की गई गन्‍ना पेराई हेतु निष्‍पादन आधारित राजसहायता को वितरित करने का निर्णय लिया है। इस स्‍कीम के तहत 213 चीनी मिलों को अब तक उत्‍पादन सब्‍सिडी के रूप में 520 करोड़ की राशि वितरित की गई है।

चीनी के व्‍यापारियों पर स्‍टॉक होल्डिंग तथा टर्न ओवर सीमा लगाना

चीनी के मूल्‍यों को व्‍यवहारिक स्‍तर पर बनाए रखने तथा उपभोक्‍ताओं को चीनी की सुचारू आपूर्ति सुनिश्‍चित करने के लिए, केंद्र सरकार ने दिनांक 29.04.2016 की राजपत्र अधिसूचना के द्वारा चीनी का स्‍टॉक रखने तथा इसके कारोबार पर सीमाएं लागू कर दी हैं। ऐसे निर्देश जारी किए गए थे कि चीनी का कोई भी व्‍यापारी उसके द्वारा ऐसा स्‍टॉक प्राप्‍त करने की तारीख से 30 दिनों से अधिक अवधि हेतु चीनी का कोई स्‍टॉक नहीं रखेगा तथा वह किसी भी समय प्रत्‍येक के सामने उल्‍लिखित मात्रा से अधिक चीनी का स्‍टाक नहीं रखेगा :-

कोलकाता तथा विस्‍तारित क्षेत्र : ऐसे व्‍यापारी जो बाहर से चीनी लाते हैं

पश्‍चिम बंगाल : 10000 क्‍विंटल

अन्‍य स्‍थानों पर : 5000 क्‍विंटल

इसके अलावा, चीनी के व्‍यापारियों पर स्‍टॉक होल्डिंग अवधि तथा कारोबार सीमा को समय- समय पर बढ़ाकर 31.12.2017 तक कर दिया गया है। तथापि, चीनी मौसम 2017-18 में चीनी के उत्‍पादन एवं इसकी उपलब्‍धता में हुए सुधार को ध्‍यान में रखते हुए, 19.12.2017 से स्‍टॉक होल्‍डिंग सीमा तथा टर्न-ओवर सीमा को हटा दिया गया है।

टैरिफ दर कोटा के तहत चीनी का आयात

मांग और आपूर्ति में क्षेत्रीय असंतुलनों को दूर करने तथा वहनीय मूल्‍य पर चीनी की उपलब्‍धता सुनिश्‍चित करने के लिए, टैरिफ दर कोटा के तहत 5 लाख टन रॉ चीनी का विभिन्‍न जोनों के पत्‍तनों से शुल्‍क-मुक्‍त आयात करने की अनुमति प्रदान की गई थी जिसमें दक्षिणी पत्‍तनों से 3 लाख टन चीनी का आयात भी शामिल है। इसके अलावा, तमिलनाडु सहित मुख्‍य रूप से दक्षिणी भारत में चीनी की उपलब्‍धता में वृद्धि करने तथा चीनी के मूल्‍य को स्‍थिर रखने हेतु सरकार ने दक्षिणी पत्‍तनों से मिलर्स/रिफाइनरीज द्वारा टैरिफ दर कोटे के तहत 25 प्रतिशत के आयात-शुल्‍क पर 3 लाख टन अतिरिक्‍त चीनी का आयात करने की अनुमति प्रदान की गई थी। आयात ऐसे मिलर्स/रिफाइनरीज के लिए खोला गया था जिनके पास रॉ चीनी को रिफाईंड/सफेद चीनी में परिवर्तित करने हेतु क्षमता उपलब्‍ध हो। यह स्‍कीम डीजीएफटी द्वारा प्रचालित की गई थी।

चीनी मिलों पर स्‍टाक होल्‍डिंग सीमा लागू करना

चीनी मूल्‍यों को उचित स्‍तर पर स्‍थिर बनाए रखने हेतु जिससे चीनी मिलें किसानों को उचित एवं लाभकारी मूल्‍य का भुगतान कर सकें, दिनांक 08.02.2018 के आदेश के तहत चीनी मिलों पर फरवरी 2018 तथा मार्च, 2018 के महीनों के लिए निम्‍नानुसार स्‍टॉक होल्‍डिंग सीमा लागू की गयी है:-

‘‘चीनी का कोई भी उत्‍पादक माह के अंत में नीचे उल्‍लिखित मात्रा से कम चीनी का स्‍टॉक नहीं रखेगा:

फरवरी, 2018: जनवरी, 2018 की अंतिम तारीख को इतिशेष स्‍टॉक के 83 प्रतिशत से कम नहीं + फरवरी, 2018 माह के दौरान उत्‍पादित चीनी – फरवरी, 2018 माह के दौरान निर्यातित चीनी

मार्च, 2018: फरवरी, 2018 की अंतिम तारीख को इतिशेष स्‍टॉक का 86 प्रतिशत से कम नहीं + मार्च, 2018 माह के दौरान उत्‍पादित चीनी – मार्च, 2018 माह के दौरान निर्यातित चीनी’’

आयात शुल्‍क में वृद्धि

चीनी के किसी अनावश्‍यक आयात को रोकने तथा घरेलू मूल्‍य को व्‍यवहारिक स्‍तर पर स्‍थिर बनाए रखने के लिए, केंद्र सरकार ने किसानों के हित में 06.02.2018 से चीनी के आयात पर आयात शुल्‍क को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया है।

चीनी के निर्यात पर सीमा शुल्‍क माफ करना

राजस्‍व विभाग की दिनांक 16.06.2016 की अधिसूचना सं. 37/2016 द्वारा चीनी के निर्यात पर 20 प्रतिशत की दर पर सीमा शुल्‍क लगाया गया था। चीनी के उत्‍पादन, स्‍टॉक स्‍थिति तथा बाजार मूल्‍य रुझानों को ध्‍यान में रखते हुए, भारत सरकार ने दिनांक 20.03.2018 की अधिसूचना सं. 30/2018 के तहत चीनी के निर्यात पर सीमा शुल्‍क हटा दिया है।

न्‍यूनतम संकेतात्‍मक कोटा (एमआईईक्‍यू)

चीनी उद्योग के इन्‍वेंटरी स्‍तर को ध्‍यान में रखते हुए तथा वित्‍तीय तरलता प्राप्‍त करने में सहायता प्रदान करने के लिए, इस विभाग के दिनांक 28.03.2018 के पत्र के तहत चीनी मौसम 2017-18 के लिए मिल-वार न्‍यूनतम संकेतात्‍मक निर्यात कोटा (एमआईईक्‍यू) निर्धारित किया गया है। चीनी के सभी ग्रेडों अर्थात रॉ, प्‍लांटेशन व्‍हाइट तथा रिफाइंड चीनी का 20 लाख टन का निर्यात कोटा चीनी कारखानों द्वारा गत दो वर्षों के प्रचालनात्‍मक चीनी मौसमों तथा मौजूदा मौसम (फरवरी-2018 तक) में उनके द्वारा किए गए औसत उत्‍पादन को ध्‍यान में रख कर उनके बीच यथानुपात में बांटा गया है।

शुल्‍क मुक्‍त आयात अधिप्रमाणन (डीएफआईए) स्‍कीम

इसके अलावा, अनुमानित घरेलू खपत से अधिक कुछ अधिशेष चीनी स्‍टॉक को निर्यात द्वारा समाप्‍त कर बाजार भाव को उभारने के लिए, सरकार ने डीजीएफटी की दिनांक 28.03.2018 की अधिसूचना द्वारा चीनी के संबंध में शुल्‍क-मुक्‍त आयात प्राधिकार (डीएफआईए) स्‍कीम भी तैयार की है।

अनुबंध-1

डा. रंगराजन समिति की सिफारिशों का कार्यान्‍वयन

मुद्दे

सिफारिशों का सार

स्‍थिति

गन्‍ना क्षेत्र का आरक्षण

कुछ समय बाद राज्‍यों को बाजार आधारित दीर्घावधिक संविदात्‍मक व्‍यवस्‍थाओं के विकास को प्रोत्‍साहित करना चाहिए और गन्‍ना आरक्षण क्षेत्र तथा बॉंडिंग को समाप्‍त करना चाहिए। इस बीच वर्तमान प्रणाली जारी रखी जा सकती हे।

राज्‍यों से इन सिफारिशों, जिन्‍हे वे उचित समझें, को कार्यान्‍वित करने पर विचार करने का अनुरोध किया गया है। अब तक, किसी राज्य ने कोई कार्रवाई नहीं की है, अतः मौजूदा व्यवस्था जारी है। महाराष्‍ट्र में क्षेत्र का कोई आरक्षण नहीं है।

न्‍यूनतम दूरी मानदण्‍ड

यह गन्‍ना किसानों अथवा चीनी क्षेत्र के विकास के हित में नहीं है तथा गन्‍ना आरक्षण क्षेत्र एवं बॉंडिंग को समापन किए जाने के साथ-साथ इसे भी समाप्त कर दिया जाए।

राज्‍यों से इन सिफारिशों, जिन्‍हे वे उचित समझें, को कार्यान्‍वित करने पर विचार करने का अनुरोध किया गया है। अब तक, किसी राज्य ने कोई कार्रवाई नहीं की है, अतः मौजूदा व्यवस्था जारी है।

गन्‍ना मूल्‍य राजस्‍व साझेदारी

उप उत्‍पादों (शीरा तथा खोई/सह-उत्‍पादन) के लिए उपलब्‍ध आंकड़ों के विश्‍लेषण के आधार पर राजस्‍व साझेदारी अनुपात एक्‍स-मिल चीनी मूल्‍य का लगभग 75 प्रतिशत आंकलित किया गया है।

राज्‍यों से इन सिफारिशों, जिन्‍हे वे उचित समझें, को कार्यान्‍वित करने पर विचार करने का अनुरोध किया गया है। अब तक केवल कर्नाटक और महाराष्ट्र ने इस सिफारिश को लागू करने के लिए राज्य अधिनियम पारित किया है।

लेवी चीनी

लेवी चीनी को समाप्‍त किया जाए। जो राज्‍य पीडीएस के अंतर्गत चीनी उपलब्‍ध कराना चाहते हैं वे अब से अपनी आवश्‍यकतानुसार चीनी सीधे बाजार से खरीदें और निर्गम मूल्‍य भी स्‍वयं तय करें। तथापि, चूंकि वर्तमान में लेवी के कारण एक अंतर्निहित क्रास-सब्‍सिडी है, इस संबंध में व्‍यय की गई लागत को पूरा करने के लिए संक्रमण अवधि हेतु राज्‍यों को कुछ हद तक केंद्रीय सहायता दी जा सकती है।

केंद्रीय सरकार ने 1अक्‍टूबर 2012 से उत्पादित चीनी से लेवी समाप्त कर दी है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के प्रचालनों के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा खरीद खुले बाजार से की जा रही है और सरकार ए.ए.वाई परिवारों के सीमित कवरेज हेतु चीनी उपलब्‍ध कराने के लिए 18.50 रूपये प्रति कि.ग्रा. की निश्‍चित सब्‍सिडी दे रही है जिन्‍हें प्रति परिवार, प्रति माह 1 कि.ग्रा. चीनी उपलब्‍ध करायी जाएगी।

विनियमित रिलीज व्‍यवस्‍था

यह व्‍यवस्‍था किसी भी उपयोगी उद्देश्‍य की पूर्ति नहीं कर रही है, तथा इसे समाप्‍त किया जा सकता हे।

रिलीज तंत्र समाप्‍त कर दिया गया है।

व्‍यापार नीति

समिति के अनुसार, चीनी संबंधी व्‍यापार नीतियां स्‍थिर होनी चाहिएं। उचित टैरिफ साधनों जैसे एक मध्‍यम निर्यात शुल्‍क, जो सामान्‍यत: मात्रात्‍मक प्रतिबंधों के विपरीत 5 फीसदी से अधिक नई दिल्‍ली हो, का प्रयोग चीनी की घरेलू आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए आर्थिक रूप से कुशल पद्धति में किया जाना चाहिए।

चीनी का आयात और निर्यात बिना किसी मात्रात्‍मक प्रतिबंधों के, नि:शुल्‍क है परंतु यह सीमा शुल्‍क की विद्यमान दर के अध्‍यधीन है। आयात शुल्‍क को 29.04.2015 से 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत तथा 10.07.2017 से 50 प्रतिशत कर दिया गया है।

जिसे अब 06.02.2018 से और बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया गया है।

राजस्‍व विभाग की दिनांक 16.06.2016 की अधिसूचना सं. 37/2016 द्वारा चीनी के निर्यात पर 20 प्रतिशत की दर पर सीमा शुल्‍क लगा दिया है।

चीनी के उत्‍पादन, स्‍टॉक स्‍थिति तथा बाजार मूल्‍य रुझानों को ध्‍यान में रखते हुए, भारत सरकार ने दिनांक 20.03.2018 की अधिसूचना सं. 30/2018 के तहत चीनी के निर्यात पर सीमा शुल्‍क हटा दिया है।

सह-उत्‍पाद

शीरा और इथेनॉल जैसे सह-उत्‍पादों पर कोई मात्रात्‍मक या संचलनात्‍मक प्रतिबंध नहीं होने चाहिएं है। उप-उत्‍पादों की कीमतें बाजार द्वारा तय हों जिसमें कोई निर्धारित अंतिम-उपयोग आवंटन न हो। चीनी मिलों द्वारा किसी भी उपभोक्‍ता को अपने अधिशेष बेचने से रोकने वाली कोई विनियामक बाधा न हो।

पेय अल्कोहल/शराब पर उत्पाद शुल्क राज्य सरकारों के लिए राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है। एथेनोल के संचलन पर राज्‍य सरकारों द्वारा प्रतिबंध और इस पर कर एवं शुल्क लगाना इथेनोल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के सफल कार्यान्वयन में एक बाधा बनी हुई है। औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग ने वर्ष 2016 की अधिसूचना सं. 27 दिनांक 14.05.2016 द्वारा आई (डी एंड आर) अधिनियम, 1951 में अब संशोधन कर दिया है। इस संशोधन से राज्य केवल मानवीय उपभोग के लिए आशयित शराब के बारे में कानून बना सकते हैं, नियंत्रण कर सकते है और/अथवा कर एवं शुल्क लगा सकते हैं। इसे छोडकर अर्थात डि-नेचर्ड इथेनोल, जो मानवीय उपभोग के लिए नहीं होता है, पर नियंत्रण केवल केन्द्र सरकार द्वारा किया जाएगा। आई (डी एंड आर) अधिनियम, 1951 में संशोधन से ईंधन ग्रेड के इथेनोल का संचलन न केवल सुचारू होगा, बल्कि यह उद्योग एथेनोल के अधिक उत्पादन हेतु प्रोत्साहित होगा, जिससे पेट्रोल के साथ ब्लेंडिंग के प्रतिशत में वृद्धि होगी।

अनिवार्य जूट पैकेजिंग

समाप्‍त किया जाए।

जूट की बोरियों में चीनी की अनिवार्य पैकेजिंग में और छूट दी गई है और उत्‍पादन के केवल 20 प्रतिशत की पैकेजिंग अनिवार्यत: जूट की बोरियों में की जानी है।


गन्‍ना मूल्‍य बकाया

यद्यपि चीनी मिलों द्वारा किसानों को गन्‍ने के मूल्‍य का भुगतान विभिन्‍न संविधियों द्वारा सांविधिक रूप से समर्थित होता है और राज्‍य सरकारों द्वारा प्रवृत्‍त किया जाता है, तथापि यह घरेलू बाजार में मूल्‍यों में परिवर्तन तथा साथ ही निर्यात संभावनाओं से संबंधित अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्थिति से प्रभावित हो जाता है। इसके बावजूद, पिछले दो चीनी मौसमों के लिए देश में चीनी का उत्‍पादन घरेलू आवश्‍यकताओं से अधिक था और 2012-13 के दौरान घरेलू आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्‍त होने की आशा है, समय पर हस्‍तक्षेप करने के कारण इन मौसमों के दौरान गन्‍ने के मूल्‍य की बकाया धनराशि न्‍यूनतम रखी जा सकी है।

31.12.2012 को स्थिति के अनुसार, चीनी मौसम 2012-13 के लिए गन्‍ना मूल्‍य के भुगतान और बकाया की स्थिति निम्‍नानुसार है :

(करोड़ रुपये में)

विवरण मूल्‍य
देय गन्‍ना मूल्‍य 17371.09
अदा किया गया गन्‍ना मूल्‍य 9531.26
गन्‍ना मूल्‍य बकाया 7839.83
देय गन्‍ना मूल्‍य की तुलना में गन्‍ना मूल्‍य बकाया की प्रतिशतता 45.13

चीनी नीति

आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955 के अधीन चीनी एक आवश्‍यक वस्तु है। केन्‍द्रीय सरकार चीनी के लिए आंशिक नियंत्रण और दोहरे मूल्‍य की नीति का अनुसरण कर रही है। इस नीति के अधीन, चीनी फैक्ट्रियों द्वारा उत्‍पादित चीनी की एक कतिपय प्रतिशतता (2009-10 चीनी मौसम के लिए बढ़ाकर 20% और 2010-11 चीनी मौसम तथा 2011-12 चीनी मौसम के लिए कम करके 10 प्रतिशत) सरकार द्वारा प्रत्‍येक मौसम के लिए उसके द्वारा निर्धारित मूल्‍य पर अनिवार्य लेवी के रूप में अधिग्रहीत कर ली जाती है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन लेवी चीनी पूरे देश में एक-समान खुदरा निर्गम मूल्‍य पर संवितरित की जाती है। विनियमित रिलीज व्‍यवस्‍था के अधीन केन्‍द्रीय सरकार द्वारा रिलीज की गई मात्रा के अनुसार गैर-लेवी (खुली बिक्री) चीनी को बेचने की अनुमति दी जाती है। वर्ष 2012-13 के दौरान, चीनी मिलों को उनके माल के प्रबंधन में अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए रिलीजें त्रैमासिक आधार पर घोषित की गईं थीं।

लेवी चीनी देयता

आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955 की धारा 3(3ग) के अधीन, लेवी चीनी का मूल्‍य (चीनी मौसम 2008-09 तक) केन्‍द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित किया जाना अपेक्षित है। तथापि, चीनी मौसम 2009-10 से लेवी चीनी का मूल्‍य निर्धारित करने के लिए दिनांक 22.12.2009 की अधिसूचना द्वारा आवश्‍यक वस्तु अधिनियम की धारा 3(3ग) में संशोधन किया गया है। निम्‍नलिखित तथ्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए मूल्‍य निर्धारित किए जाते हैं :

  • इस धारा के अधीन केन्‍द्रीय सरकार द्वारा चीनी मौसम 2008-09 तक गन्‍ने का निर्धारित न्‍यूनतम मूल्‍य, यदि कोई हो, और चीनी मौसम 2009-10 से उचित और लाभकारी मूल्‍य,
  • चीनी की विनिर्माण लागत
  • उस पर अदा किया गया देय शुल्‍क अथवा कर, यदि कोई हो; और
  • चीनी के विनिर्माण के व्‍यवसाय में लगाई गई पूंजी पर उचित लाभ।

चीनी सब्सिडी

राज्य सरकारों द्वारा चीनी के उठान, ढुलाई और वितरण पर किए गए व्यय और थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता के मार्जिन को जोड़कर तथा खुदरा निर्गम मूल्य पर लेवी चीनी की बिक्री से प्राप्त धनराशि घटाकर परिकलित धनराशि केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों को भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से चीनी सब्सिडी के रूप में अदा की जाती है। वास्तव में, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के प्रचालनों के कारण पूरी चीनी सब्सिडी भारत सरकार द्वारा दी जाती है। चीनी के वर्तमान लेवी मूल्यों पर इस कारण से सब्सिडी की वार्षिक आवश्यकता लगभग 3000 करोड़ रूपये है। देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन लेवी चीनी का खुदरा निर्गम मूल्य 01.03.2002 से 13.50 रूपये प्रति किलोग्राम है।

इथनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम (ईबीपी कार्यक्रम)

इथनॉल कृषि आधारित उत्‍पाद है जो चीनी उद्योग के सह-उत्‍पाद शीरा से निकाला गया मौलिक उत्‍पाद है। गन्‍ना के अधिशेष उत्‍पादन वाले वर्षों में, जब चीनी की कीमतें काफी कम हो जाती हैं तो चीनी उद्योग किसानों के गन्‍ने की कीमत का भुगतान करने में असमर्थ हो जाता है। यह मुख्‍यतया चीनी का अत्‍यधिक उत्‍पादन होने से होता है। इथनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम न केवल प्रदूषण को कम करता है वरन यह इथनॉल के उपयोग के लिए एक अन्‍य आऊटलेट भी प्रदान करता है। इस प्रकार चीनी के उत्‍पादन के दौरान शीरे के सह-उत्‍पाद के रूप में इसका उपयोग सुनिश्‍चित होता है।

इथनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम वर्ष 2007 से आरम्‍भ किया गया है। मंत्रिमंडल की आर्थिक कार्य समिति ने 22 नवम्बर, 2012 को हुई अपनी बैठक में इथनॉल के मूल्‍य निर्धारण पर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्टों पर मंत्रियों के समूह और प्रधान मंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सिफारिशों पर विचार किया और यह अनुमोदित किया कि सरकार द्वारा इथनॉल का खरीद मूल्य निर्धारित नहीं किया जाएगा और अब यह विपणन कम्पनियों तथा आपूर्तिकर्ताओं के बीच तय किया जाएगा। मंत्रिमंडल के उपर्युक्त निर्णय के अनुसरण में, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पूरे देश में पेट्रोल में 5 प्रतिशत अनिवार्य मिश्रण को क्रियान्वित करने के लिए दिनांक 02.01.2013 को एक गजट अधिसूचना जारी की है।

चीनी क्षेत्र के संबंध में डॉ. सी. रंगराजन समिति की रिपोर्ट

चीनी उद्योग के संबंध में डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता में समिति ने अपनी रिपोर्ट 05 अक्तूबर, 2012 को सरकार को प्रस्तुत कर दी है। समिति ने, अन्य बातों के साथ-साथ, लेवी चीनी की देयता समाप्त करने, गैर-लेवी चीनी पर विनियमित रिलीज व्यवस्‍था समाप्त करने, गन्ने के मूल्य-निर्धारण को युक्तियुक्त करने, गन्ना क्षेत्र आरक्षण प्रणाली और बांडिंग समाप्त करने, न्यूनतम दूरी का मानदंड समाप्त करने क्योंकि राज्य गन्ना क्षेत्र आरक्षण जारी रखते हैं, चीनी व्यापार का उदारीकरण करने, वास्तविक उपयोग के आवंटन निर्धारित किए बिना सह-उत्पादों के बाजार मूल्यों का निर्धारण करने और चीनी को जूट पैकेजिंग सामग्री (पैकेजिंग वस्तु में अनिवार्य उपयोग) अधिनियम, 1987 के दायरे से बाहर रखने की सिफारिशें की हैं। समिति की सिफारिशें सरकार के विचाराधीन हैं।

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